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Monday, May 15, 2017
Tuesday, June 07, 2016
जीवन के मूल आधार
*सफल जीवन* *के* *सूत्र*
✍1. *जीवन*
जब तुम पैदा हुए थे तो तुम रोए थे जबकि पूरी दुनिया ने जश्न मनाया था। अपना जीवन ऐसे जियो कि तुम्हारी मौत पर पूरी दुनिया रोए और तुम जश्न मनाओ।
✍2. *कठिनाइयों*
जब तक आप अपनी समस्याओं एंव कठिनाइयों की वजह दूसरों को मानते है, तब तक आप अपनी समस्याओं एंव कठिनाइयों को मिटा नहीं सकते|
✍3. *असंभव*
इस दुनिया में असंभव कुछ भी नहीं| हम वो सब कर सकते है, जो हम सोच सकते है और हम वो सब सोच सकते है, जो आज तक हमने नहीं सोचा|
✍4. *हार ना मानना*
बीच रास्ते से लौटने का कोई फायदा नहीं क्योंकि लौटने पर आपको उतनी ही दूरी तय करनी पड़ेगी जितनी दूरी तय करने पर आप लक्ष्य तक पहुँच सकते है|
✍5. *हार जीत*
सफलता हमारा परिचय दुनिया को करवाती है और असफलता हमें दुनिया का परिचय करवाती है|
✍6. *आत्मविश्वास*
अगर किसी चीज़ को दिल से चाहो तो पूरी कायनात उसे तुमसे मिलाने में लग जाती है
✍7. *महानता*
महानता कभी न गिरने में नहीं बल्कि हर बार गिरकर उठ जाने में है|
✍8. *गलतियां*
अगर आप समय पर अपनी गलतियों को स्वीकार नहीं करते है तो आप एक और गलती कर बैठते है| आप अपनी गलतियों से तभी सीख सकते है जब आप अपनी गलतियों को स्वीकार करते है|
✍9. *चिन्ता*
अगर आप उन बातों एंव परिस्थितियों की वजह से चिंतित हो जाते है, जो आपके नियंत्रण में नहीं तो इसका परिणाम समय की बर्बादी एवं भविष्य पछतावा है|
✍10. *शक्ति*
ब्रह्माण्ड की सारी शक्तियां पहले से हमारी हैं| वो हम हैं जो अपनी आँखों पर हाथ रख लेते हैं और फिर रोते हैं कि कितना अन्धकार है|
✍11. *मेहनत*
हम चाहें तो अपने आत्मविश्वास और मेहनत के बल पर अपना भाग्य खुद लिख सकते है और अगर हमको अपना भाग्य लिखना नहीं आता तो परिस्थितियां हमारा भाग्य लिख देंगी|
✍12. *सपने*
सपने वो नहीं है जो हम नींद में देखते है, सपने वो है जो हमको नींद नहीं आने देते।
✍13. *समय*
आप यह नहीं कह सकते कि आपके पास समय नहीं है क्योंकि आपको भी दिन में उतना ही समय (24 घंटे) मिलता है जितना समय महान एंव सफल लोगों को मिलता है|
✍14. *विश्वास*
विश्वास में वो शक्ति है जिससे उजड़ी हुई दुनिया में प्रकाश लाया जा सकता है| विश्वास पत्थर को भगवान बना सकता है और अविश्वास भगवान के बनाए इंसान को भी पत्थर दिल बना सकता है|
✍16. *सफलता*
दूर से हमें आगे के सभी रास्ते बंद नजर आते हैं क्योंकि सफलता के रास्ते हमारे लिए तभी खुलते जब हम उसके बिल्कुल करीब पहुँच जाते है|
✍17. *सोच*
बारिश की दौरान सारे पक्षी आश्रय की तलाश करते है लेकिन बाज़ बादलों के ऊपर उडकर बारिश को ही avoid कर देते है। समस्याए common है, लेकिन आपका नजरिया इनमे difference पैदा करता है।
✍18. *प्रसन्नता*
यह पहले से निर्मित कोई चीज नहीं है..ये आप ही के कर्मों से आती है
Sunday, December 09, 2012
भारत का भूगोल Crazy Rollercoaster_Chromegame - Play the best free online games.
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भारत का भूगोल
| भारत | |
|---|---|
| महाद्वीप | एशिया |
| अञ्चल | दक्षिण एशिया भारतीय उपमहाद्वीप |
| स्थिति | 21°N 78°E / 21, 78 |
| क्षेत्रफल | क्रम 7th 32,87,263 km² (12,69,219.3 sq mi) 90.44% स्थलभाग 9.56 % जलभाग |
| सीमान्त | Total land borders:[1] 15,106.70 कि.मी. (9,386.87 मील) बांग्लादेश: 4,096.70 कि.मी. (2,545.57 मील) चीन: 3,488 कि.मी. (2,167 मील) पाकिस्तान: 2,910 कि.मी. (1,808 मील) नेपाल: 1,751 कि.मी. (1,088 मील) बर्मा: 1,643 कि.मी. (1,021 मील) भूटान: 699 कि.मी. (434 मील) |
| सर्वोच्च बिन्दु | कंचनजंगा 8,598 मी. (28,208.7 फुट) |
| सर्वनिम्न बिन्दु | कन्याकुमारी -2.2 मी. (-7.2 फुट) |
| सबसे लम्बी नदी | गंगा–ब्रह्मपुत्र[कृपया उद्धरण जोड़ें] |
| सबसे बड़ी झील | चिल्का झील |
अनुक्रम |
[संपादित करें] भूगर्भीय सरंचना
भूगभीय सरंचना (geological features) के आधार पर भारत को हम तीन स्पष्ट विभागों में बाँट सकते हैं :- १. दक्षिण का प्रायद्वीपीय पठार,
- २. उत्तर की विशाल पर्वतमाला तथा
- ३. इन दोनों के बीच स्थित विस्तृत समतल मैदान।
[संपादित करें] दक्षिण प्रायद्वीपीय पठार
यह भारत का प्राचीनतम भूखंड है। इसका निर्माण पृथ्वी के अन्य प्राचीनतम भूखंडों की तरह, भूवैज्ञानिक इतिहास के प्रारंभ काल में हुआ था जिसे आद्यमहाकल्प (Archaear Era) कहते हैं। तब से यह बराबर स्थल रहा है और कभी भी समुद्र के नीचे नहीं गया है। इसका प्रमाण इसमें पाई जानेवाली चट्टानों से बना हुआ है जिनमें मुख्य ग्रेनाइट, नाइस और शिस्ट हैं। जहाँ कहीं परतदार चट्टानें मिलती हैं, वे भी अत्यंत पुरानी हैं ओर उनके समुद्र में जमा होने का कोई प्रमाण नहीं मिलता। इससे स्पष्ट है कि यह अपने इतने लंबे जीवनकाल मे कभी समुद्र के नीचे नहीं गया और बराबर स्थल ही के रूप में वर्तमान रहा है। एक दूसरी विशेषता इस स्थलखंड की यह है कि यह अत्यंत प्राचीन काल से पर्वत निर्माणकारी भूसंचलन से भी मुक्त रहा है। इस बीच में संसार में भूगर्भिक हलचल के जितने भी अवसर आए, उनसे यह अप्रभावित और अक्षुण्ण रहा है। विंध्य पर्वत की परतदार चट्टानें इतनी पुरानी होने पर भी क्षैतिज अवस्था में पाई जाती हैं। भूपटल के इस प्रकार के स्थिर खंडों को शील्ड (shield) कहते हैं। इसमें मोड़दार पर्वत नहीं मिलते और जो पर्वत नहीं मिलते हैं वे अवशिष्ट अथवा घर्षित वर्ग के हैं। अरावली पर्वत भी एक अवशिष्ट पर्वत है। इसका विस्तार शायद हिमालय पर्वत माला से कम नहीं था, किंतु इस समय हम उसका एक अवशेष मात्र पाते हैं। पूर्वी घाट तथा पश्चिमी घाट भी अवशिष्ट पहाड़ों के उदाहरण हैं। दक्षिणी प्रायद्वीप में जो भी भुसंचलन के प्रमाण मिलते हैं वे केवल लंबवत् संचलन के हैं जिससे दरारों अथवा भ्रंशों का निर्माण हुआ। इस प्रकार का पहला संचलन मध्यजीवी महाकल्प (Mesozoic Era) अथवा गोंडवाना काल में हुआ। समांतर भ्रंशों के बीच की भूमि नीचे धँस गई और उन धँसे भागों में अनुप्रस्थ परतदार चट्टानों को गोंडवान क्रम की चट्टानों में मिलता है। इनका विस्तार, दामोदर, महानदी तथा गोदावरी नदियों की घाटियों में लंबे एवं सकीर्ण क्षेत्रों में पाया जाता है। दूसरा लंबवत् संचालन मध्यजीवी महाकल्प के अंतिम काल में हुआ, जबकि लंबी दरारों से लावा निकल कर प्रायद्वीप के उत्तर-पश्चिमी भागों के विस्तृत क्षेत्र में फैल गया। दक्कन का यह लावा क्षेत्र अब भी लगभग दो लाख वर्ग मील में फैला हुआ पाया जाता है। इस क्षेत्र की चट्टान बेसाल्ट है जिसके विखंडन से काली मिट्टी का निर्माण हुआ है।अत्यंत प्राचीन काल से स्थिर एवं स्थल भाग रहने के कारण दक्षिणी प्रायद्वीप में अनावृत्तिकरण शक्तियां निरंतर काम करती रही हैं जिसके फलस्वरूप इसका अधिकांश घर्षित हो गया है, अंदर की पुरानी चट्टानें धरातल पर आ गई हैं और नदियाँ अपक्षरण के आधार तल तक पहुँच गई हैं।
[संपादित करें] हिमालय पर्वतमाला
इसकी संरचना दक्षिणी प्रायद्वीप से बहुत ही भिन्न है। यद्यपि इसके कुछ भागों में प्राचीन चट्टानें मिलती हैं, तथापि अधिकांशत: यह नवीन परतदार चट्टानों द्वारा निर्मित है, जो लाखों वर्षो तक टेथिस समुद्र में एकत्रित होती रही थीं। इन परतदार चट्टानों की मोटाई बहुत है और वे प्राय: भूवैज्ञानिक इतिहास के प्रथम (primary or palaeozoic) या पुराजीवी महाकल्प के कैंब्रियन काल से आरंभ होकर, द्वितीय (Tertiary) महाकल्प के आरंभ तक समुद्र में जमा होती रहीं। सागर में एकत्रित मलबों ने तृतीय महाकल्प में भूसंचलन के कारण विशाल मोड़दार श्रेणियों का रूप धारण किया। इस प्रकार हिमालय पर्वतमाला मुख्यत: वैसी चट्टानों से निर्मित है, जो समुद्री निक्षेप से बनी हैं और दक्षिणी पठार की तुलना में यह एक स्थल है। इसमें पर्वत निर्माणकारी संचलन के प्रभाव के सभी प्रमाण मिलते हैं। परतदार चट्टानें जो क्षैतिज अवस्था में जमा हुई थीं, भूसंचलन के प्रभाव से अत्यंत मुड़ गई हैं और एक दूसरे पर चढ़ गई हैं। विशाल क्षेत्रों में वलन (folds), भ्रंश (faults), क्षेप-भ्रंश (thrust faults) तथा शयान वलन (recumbent folding) के उदाहरण मिलते हैं। ये वास्तविक अर्थ में पर्वत हैं जिनका निर्माण भूसंचलन पर निर्भर है और उसपर अनावृत्तीकरण शक्तियों ने उतना अधिक परिवर्तन नहीं किया है जितना दक्षिणी प्रायद्वीप में। यहाँ की नदियाँ अपनी युवावस्था में हैं और अभी तक अपनी तली को गहरी काटती जा रही हैं। इसलिए इनमें गहरी, संकीर्ण एवं खड़ी घाटियाँ तथा गार्ज़ (gorge) मिलते हैं। सिंधु, सतलुज तथा ब्रह्मपुत्र नदियों के महान् गॉर्जो के अतिरिक्त अन्य नदियों ने भी इसमें गहरी घाटियाँ काटी हैं।[संपादित करें] उत्तरी भारत का विस्तृत मैदान
यह भूवैज्ञानिक दृष्टि से सबसे नवीन तथा कम महत्वपूर्ण है। हिमालय पर्वतमाला के निर्माण के समय उत्तर से जो भूसंचलन आया उसके धक्के से प्रायद्वीप का उत्तरी किनारा नीचे धँस गया जिससे विशाल खड्ड बन गया। हिमालय पर्वत से निकलनेवाली नदियों ने अपने निक्षेपों द्वारा इस खड्ड को भरना शुरू किया, और इस प्रकार उन्होंने कालांतर में एक विस्तृत मैदान का निर्माण किया। इस प्रकार यह मैदान मुख्यत: हिमालय के अपक्षरण से उत्पन्न तलछट और नदियों द्वारा जमा किए हुए जलोढक से बना है। इसमें बालू तथा मिट्टी की तहें मिलती हैं, जो अत्यंतनूतन (Pleistocene) और नवीनतम काल की हैं। यह विस्तृत मैदान लगभग समतल है और उससे होकर उत्तर भारत (तथा पाकिस्तान) की नदियाँ गंगा, सिंधु, ब्रह्मपुत्र मंदगति से समुद्र की ओर बहती हैं।[संपादित करें] धरातलीय रूप
धरातल के अनुसार भी भारत के तीन मुख्य प्राकृतिक विभाग हैं : उत्तरी पर्वतमाला, उत्तरी भारत का मैदान और दक्षिण का पठार।[संपादित करें] उत्तरी पर्वतमाला
भारत के उत्तर में हिमालय की पर्वतमाला नए और मोड़दार पहाड़ों से बनी है। यह पर्वतश्रेणी असम से कश्मीर तक लगभग १,५०० मील तक फैली हुई है। इसकी चौड़ाई १५० से २०० मील तक है। यह संसार की सबसे ऊँची पर्वतमाला है और इसमें अनेक चोटियाँ २४,००० फुट से अधिक ऊँची हैं। हिमालय की सबसे ऊँची चोटी माउंट एवरेस्ट है जिसकी ऊँचाई २९,०२८ फुट है। यह नेपाल में स्थित है। अन्य मुख्य चोटियाँ कांचनजुंगा (२७,८१५ फुट), धौलागिरि (२६,७९५ फुट), नंगा पर्वत (२६,६२० फुट), गोसाईथान (२६,२९१ फुट), नंदादेवी (२५,६४५ फुट) इत्यादि हैं। गॉडविन ऑस्टिन (माउंट के २) जो २८,२५० फुट ऊँची है, हिमालय का नहीं, बल्कि कश्मीर के कराकोरम पर्वत का एक शिखर है। हिमालय प्रदेश में १६,००० फुट से अधिक ऊँचाई पर हमेशा बर्फ जमी रहती है। इसलिए इस पर्वतमाला को हिमालय कहना सर्वथा उपयुक्त है।हिमालय के अधिकतर भाग में तीन समांतर श्रेणियाँ मिलती हैं। इन्हें उत्तर से दक्षिण क्रमश:
- (क) बृहत् अथवा आभ्यांतरिक हिमालय (The great or inner Himalayas),
- (ख) लघु अथवा मध्य हिमालय (The lesser or middle Himalayas) और
- (ग) बाह्य हिमालय (Outer Himalayas) कहते हैं।
पूर्व में भारत और बर्मा के बीच के पहाड़ भिन्न भिन्न नामों से ख्यात हैं। उत्तर में यह पटकोई की पहाड़ी कहलाती है। नागा पर्वत से एक शाखा पश्चिम की ओर असम में चली गई हैं जिसमें खासी और गारो की पहाड़ियाँ है। इन पहाड़ों की औसत ऊँचाई ६,००० फुट है और अधिक वर्षा के कारण ये घने जंगलों से आच्छादित हैं।
हिमालय की ऊँची पर्वतमाला को कुछ ही स्थानों पर, जहाँ दर्रे हैं, पार किया जा सकता है। इसलिए इन दर्रो का बड़ा महत्व है। उत्तर-पश्चिम में खैबर और बोलन के दर्रे हैं जो अब पाकिस्तान में हैं। उत्तर में रावलपिंडी से कश्मीर जाने का रास्ता है जो अब पाकिस्तान के अधिकार में है। भारत ने एक नया रास्ता पठानकोट से बनिहाल दर्रा होकर श्रीनगर जाने के लिए बनाया है। श्रीनगर से जोजीला दर्रे द्वारा लेह तक जाने का रास्ता है। हिमालय प्रदेश से तिब्बत जाने के लिए शिपकी दर्रा है जो शिमला के पास है। फिर पूर्व में दार्जिलिंग का दर्रा है, जहाँ से चुंबी घाटी होते हुए तिब्बत की राजधानी लासा तक जाने का रास्ता है। पूर्व की पहाड़ियों में भी कई दर्रे हैं जिनसे होकर बर्मा जाया जा सकता है। इनमें मुख्य मनीपुर तथा हुकौंग घाटी के दर्रे हैं।
[संपादित करें] उत्तरी भारत का मैदान
हिमालय के दक्षिण में एक विस्तृत समतल मैदान है जो लगभग सारे उत्तर भारत में फैला हुआ है। यह गंगा, ब्रह्मपुत्र तथा सिंधु और उनकी सहायक नदियों द्वारा बना है। यह मैदान गंगा सिंधु के मैदान के नाम से जाना जाता है। इसका अधिकतर भाग गंगा, नदी के क्षेत्र में पड़ता है। सिंधु और उसकी सहायक नदियों के मैदान का आधे से अधिक भाग अब पश्चिमी पाकिस्तान में पड़ता है और भारत में सतलुज, रावी और व्यास का ही मैदान रह गया है। इसी प्रकार पूर्व में, गंगा नदी के डेल्टा का अधिकांश भाग पूर्वी पाकिस्तान में पड़ता है। उत्तर का यह विशाल मैदान पूर्व से पश्चिम, भारत की सीमा के अंदर लगभग १,५०० मील लंबा है। इसकी चौड़ाई १५० से २०० मील तक है। इस मैदान में कहीं कोई पहाड़ नहीं है। भूमि समतल है और समुद्र की सतह से धीरे धीरे पश्चिम की ओर उठती गई। कहीं भी यह ६०० फुट से अधिक ऊँचा नहीं है। दिल्ली, जो गंगा और सिंधु के मैदानों के बीच अपेक्षाकृत ऊँची भूमि पर स्थित है, केवल ७०० फुट ऊँची भूमि पर स्थित है। अत्यंत चौरस होने के कारण इसकी धरातलीय आकृति में एकरूपता का अनुभव होता है, किंतु वास्तव में कुछ महत्वपूर्ण अंतर पाए जाते हैं। हिमालय (शिवालिक) की तलहटी में जहाँ नदियाँ पर्वतीय क्षेत्र को छोड़कर मैदान में प्रवेश करती हैं, एक संकीर्ण पेटी में कंकड पत्थर मिश्रित निक्षेप पाया जाता है जिसमें नदियाँ अंतर्धान हो जाती हैं। इस ढलुवाँ क्षेत्र को भाभर कहते हैं। भाभर के दक्षिण में तराई प्रदेश है, जहाँ विलुप्त नदियाँ पुन: प्रकट हो जाती हैं। यह क्षेत्र दलदलों और जंगलों से भरा है। इसका निक्षेप भाभर की तुलना में अधिक महीन कणों का है। भाभर की अपेक्षा यह अधिक समतल भी है। कभी कहीं जंगलों को साफ कर इसमें खेती की जाती है। तराई के दक्षिण में जलोढ़ मैदान पाया जाता है। मैदान में जलोढ़क दो किस्म के हैं, पुराना जलोढ़क और नवीन जलोढ़क। पुराने जलोढ़क को बांगर कहते हैं। यह अपेक्षाकृत ऊँची भूमि में पाया जाता है, जहाँ नदियों की बाढ़ का जल नहीं पहुँच पाता। इसमें कहीं कहीं चूने के कंकड मिलते हैं। नवीन जलोढ़क को खादर कहते हैं। यह नदियों की बाढ़ के मैदान तथा डेल्टा प्रदेश में पाया जाता है, जहाँ नदियाँ प्रति वर्ष नई तलछट जमा करती हैं। मैदान के दक्षिणी भाग में कहीं कहीं दक्षिणी पठार से निकली हुई छोटी मोटी पहाड़ियाँ मिलती हैं। इसके उदाहरण बिहार में गया तथा राजगिरि की पहाड़ियाँ हैं।आर्थिक दृष्टि से उत्तरी भारत का मैदान देश का सबसे अधिक उपजाऊ और विकसित भाग है। प्राचीन काल से यह आर्य सभ्यता का केंद्र रहा है। यहाँ कृषि के अतिरिक्त अनेक उद्योग धंधे हैं, नगरों की बहुलता है और यातायात के साधन उन्नत हैं। यही भारत का सबसे घना आबाद क्षेत्र है और यहीं देश की लगभग दो तिहाई जनसंख्या बसी है।
[संपादित करें] दक्षिण का पठार
उत्तरी भारत के मैदान के दक्षिण का पूरा भाग एक विस्तृत पठार है जो दुनिया के सबसे पुराने स्थल खंड का अवशेष है और मुख्यत: कड़ी तथा दानेदार कायांतरित चट्टानों से बना है। पठार तीन ओर पहाड़ी श्रेणियों से घिरा है। उत्तर में विंध्याचल तथा सतपुड़ा की पहाड़ियाँ हैं, जिनके बीच नर्मदा नदी पश्चिम की ओर बहती है। नर्मदा घाटी के उत्तर विंध्याचल प्रपाती ढाल बनाता है। सतपुड़ा की पर्वतश्रेणी उत्तर भारत को दक्षिण भारत से अलग करती है, और पूर्व की ओर महादेव पहाड़ी तथा मैकाल पहाड़ी के नाम से जानी जाती है। सतपुड़ा के दक्षिण अजंता की पहाड़ियाँ हैं। प्रायद्वीप के पश्चिमी किनारे पर पश्चिमी घाट और पूर्वी किनारे पर पूर्वी घाट नामक पहाडियाँ हैं। पश्चिमी घाट पूर्वी घाट की अपेक्षा अधिक ऊँचा है और लगातार कई सौ मीलों तक, ३,५०० फुट की ऊँचाई तक चला गया है। पूर्वी घाट न केवल नीचा है, बल्कि बंगाल की खाड़ी में गिरनेवाली नदियों ने इसे कई स्थानों में काट डाला है जिनमें उत्तर से दक्षिण महानदी, गोदावरी, कृष्णा तथा कावेरी मुख्य हैं। दक्षिण में पूर्वी और पश्चिमी घाट नीलगिरि की पहाड़ी में मिल जाते है, जहाँ दोदाबेटा की ८,७६० फुट ऊँची चोटी है। नीलगिरि के दक्षिण अन्नाईमलाई तथा कार्डेमम (इलायची) की पहाड़ियाँ हैं। अन्नाईमलाई पहाड़ी पर अनेमुडि, पठार की सबसे ऊँची चोटी (८,८४० फुट) है। इन पहाड़ियों और नीलगिरि के बीच पालघाट का दर्रा है जिससे होकर पश्चिम की ओर रेल गई है। पश्चिमी घाट में बंबई के पास थालघाट और भोरघाट दो महत्वपूर्ण दर्रे हैं जिनसे होकर रेलें बंबई तक गई हैं।उत्तर-पश्चिम में विंध्याचल श्रेणी और अरावली श्रेणी के बीच मालवा के पठार हैं जो लावा द्वारा निर्मित हैं। अरावली श्रेणी दक्षिण में गुजरात से लेकर उत्तर में दिल्ली तक कई अवशिष्ट पहाड़ियों के रूप में पाई जाती है। इसके सबसे ऊँचे, दक्षिण-पश्चिम छोर में माउंट आबू (५,६५० फुट) स्थित है। उत्तर-पूर्व में छोटानागपुर का पठार है, जहाँ राजमहल पहाड़ी प्रायद्वीपीय पठार की उत्तर-पूर्वी सीमा बनाती है। किंतु असम का शिलौंग पठार भी प्रायद्वीपीय पठार का ही भाग है जो गंगा के मैदान द्वारा अलग हो गया है।
दक्षिण के पठार की औसत ऊँचाई १,५०० से ३,०० फुट तक है। ढाल पश्चिम से पूर्व की ओर है। नर्मदा और ताप्ती को छोड़कर बाकी सभी नदियाँ पूर्व की ओर बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं। पठार के पश्चिमी तथा पूर्वी किनारों पर उपजाऊ तटीय मैदान मिलते हैं। पश्चिमी तटीय मैदान संकीर्ण हैं, इसके उत्तरी भाग को कोंकण और दक्षिणी भाग को मालाबार कहते हैं। पूर्वी तटीय मैदान अपेक्षाकृत चौड़ा है और उत्तर में उड़ीसा से दक्षिण में कुमारी अंतरीप तक फैला हुआ है। महानदी, गोदावरी, कृष्णा तथा कावेरी नदियाँ जहाँ डेल्टा बनाती हैं वहाँ यह मैदान और भी अधिक चौड़ा हो गया है। मैदान का दक्षिणी भाग कर्नाटक, और उत्तरी भाग उत्तरी सरकार कहलाता है। इनके तट का नाम क्रमश: कारोमंडल तट तथा गोलकुंडा तट है।
[संपादित करें] अन्य सूचना
भारत के अधिकतर उत्तरी और उत्तरपश्चिमीय प्रांत हिमालय की पहाङियों में स्थित हैं। शेष का उत्तरी, मध्य और पूर्वी भारत गंगा के उपजाऊ मैदानों से बना है। उत्तरी-पूर्वी पाकिस्तान से सटा हुआ, भारत के पश्चिम में थार का मरुस्थल है। दक्षिण भारत लगभग संपूर्ण ही दक्खन के पठार से निर्मित है। यह पठार पूर्वी और पश्चिमी घाटों के बीच स्थित है।कई महत्त्वपूर्ण और बडी नदियाँ जैसे गंगा, ब्रह्मपुत्र, यमुना, गोदावरी और कृष्णा भारत से होकर बहती हैं। इन नदियों के कारण उत्तर भारत की भूमि कृषि के लिये उपजाऊ है।
भारत के विस्तार के साथ ही इसके मौसम में भी बहुत भिन्नता है। दक्षिण में जहाँ तटीय और गर्म वातावरण रहता है वहीं उत्तर में कडी सर्दी, पूर्व में जहाँ अधिक बरसात है वहीं पश्चिम में रेगिस्तान की शुष्कता। भारत में वर्षा मुख्यतया वरशा की हवाओं से होती है। भारत संघ 32,87,590 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र को कवर करता है यह दुनिया में 7वा सबसे बड़ा देश है और यह दक्षिण एशिया का एक महत्वपूर्ण देश है दक्षिण एशिया 4,488 मिलियन वर्ग किमी है जिसमें से भारत का सबसे बड़ा क्षेत्र है यह कुल क्षेत्रफल का 73.2% हैं यह दक्षिण एशिया में दूसरा सबसे बड़ा देश है, पाकिस्तान से 4 गुना, और ब्रिटेन से 12 गुना बड़ा है और जापान की तुलना में 8 गुना बड़ा है भारत अक्षांश (latitude) 8o4' उत्तर से 37o6' उत्तर और देशांतर(Longitude) ग्रीनविच (Greenwhich) से 68o7’ पूर्व से 97o25’ पूर्व भूमि में फैला है भारतीय क्षेत्र में सुदूर दक्षिण भाग में बिंदु, ग्रेट निकोबार द्वीप समूह में इंदिरा प्वाइंट (6o45’') है, जबकि भारतीय मुख्य भूमि के दक्षिण भाग में बिंदु कन्याकुमारी(Cape comorin) है, यह देश विश्व ग्लोब मानचित्र में उत्तरी और पूर्वी गोलार्द्धों में आता है भारत का मानक समय (Indian Standard Time) 82o30' ई(E) देशांतर के रूप में लिया जाता है, जो की GMT +05:30 है यह भारत के बीच (नैनी, इलाहाबाद के पास से.) के माध्यम से गुजरता है इसलिए नैनी इलाहाबाद के पास भारत का मानक समय है देश एक विशाल आकार और उत्तर से दक्षिण के लिए 3214 किलोमीटर और पश्चिम से पूर्व में 2933 किलोमीटर है इसका
भारतीय मानक समय: GMT +05:30,
देश का टेलीफोन कोड: - 91,
समुद्र तट: 7,516.6 किलोमीटर मुख्य भूमि लक्षद्वीप और अंडमान व निकोबार द्वीप समूह शामिल है भारत के दक्षिण में हिंद महासागर है, दक्षिण पश्चिम में अरब सागर है और दक्षिण पूर्व में बंगाल की खाड़ी है कुल समुन्द्री तट जो की करीब 6100 किलोमीटर का है और भारत की भूमि सीमा 15,200 किलोमीटर लंबा है मुख्य भूमि के समुद्र तट की कुल लंबाई लक्षद्वीप, द्वीप और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के साथ 7,519.5 किलोमीटर का है
सबसे लंबी नदी - गंगा नदी,
सबसे बड़ी झील - चिल्का झील,
हिमालय उच्चतम प्वाइंट- कंचन जंगा (8598 मीटर),
निम्नतम बिंदु - कुट्टनाड (-2.2 मीटर),
उत्तरी बिंदु - काराकोरम के पास सियाचिन ग्लेशियर,
सुदूर दक्षिण भाग में - इंदिरा बिंदु ग्रेट निकोबार, अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह,
भारत के दक्षिणी प्वाइंट (मुख्यभूमि वाला)- कन्या कुमारी (Cape Comorin),
पश्चिम प्वाइंट - घुआर मोटा(Ghuar Mota), गुजरात,
पूरबी प्वाइंट - किबिथू (Kibithu), अरुणाचल प्रदेश,
सर्वोच्च आल्टीटयूट- कंचनजंगा, सिक्किम,
न्यूनतम ऊंचाई- कुट्टनाड (केरल),
[संपादित करें] भारत के नगर
देखें, भारत के शहरभारत के मुख्य शहर है - दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई, बंगलोर (बेंगलुरु )।
[संपादित करें] सन्दर्भ
- ↑ गलती उद्घृत करें:
<ref>का गलत प्रयोग;DBMनाम के संदर्भ में जानकारी नहीं है।
[संपादित करें] इन्हें भी देंखे
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- अन्तिम परिवर्तन 13:39, 9 नवम्बर 2012।
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